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दलित और आदिवासी महिलाओं के विरुद्ध हिंसा — कानून, समानता और न्याय का प्रश्न
दलित और आदिवासी महिलाओं के विरुद्ध हिंसा केवल सामाजिक अन्याय का विषय नहीं है, बल्कि यह समानता, गरिमा, कानूनी संरक्षण और न्याय से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न भी उठाती है। यह लेख भारतीय संविधान, आपराधिक कानून और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के कानूनी ढाँचे के माध्यम से इस मुद्दे को समझने का प्रयास करता है। साथ ही, पीड़ितों के अधिकार, कानून के वास्तविक कार्यान्वयन और न्यायिक प्रक्रिया में संस्थागत जिम्मेदारी जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी ध्यान केंद्रित करता है।
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